रुस और यूक्रेन के युद्ध के कई कारण है लेकिन सबसे बड़ा कारण नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (NATO) को माना जा रहा है। 1949 में सोवियत संघ से निपटने के लिए नाटो का संगठन किया गया था।
नई दिल्ली: 300 दिनों से रुस और यूक्रेन के बीच भयंकर युद्ध चल रहा है। इसी को लेकर राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने एक बड़ा बयान दिया है। बता दें, व्लादिमीर पुतिन रुस और यूक्रेन के युध्द को खत्म करना चाहते है। पुतिन ने ये भी कहा कि इसके लिए हम यह सुनिश्चित करने की कोशिश करेंगे कि यह सब समाप्त हो जाए और जितनी जल्दी हो, उतना अच्छा है और आगे भी इस तरह के प्रयास करते रहेंगे। इसी के साथ आज हम आपको रुस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध का क्या कारण है? यह बताएंगे….

रुस और यूक्रेन के युद्ध को खत्म करना चाहते है, पुतिन
रुस और यूक्रेन के बीच लगभग 10 महीनों से भी ज्यादा का समय हो चुके युद्ध को लेकर राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का एक बड़ा बयान सामने आया है। जिसमें उन्होंने कहा कि वे अब जंग खत्म करना चाहते हैं। व्लादिमीर पुतिन ने रूस में मीडिया को संबोधित करते हुए कहा है कि, यूक्रेन के साथ लंबे समय से जारी जंग को खत्म करना चाहते है। उन्होंने आगे कहा कि, उनका लक्ष्य सैन्य संघर्ष को जारी रखना नहीं है। बल्कि वो तो इसके विपरीत युद्ध को समाप्त करना चाहते हैं। पुतिन ने ये भी कहा कि इस के लिए हम यह सुनिश्चित करने की कोशिश करेंगे कि यह सब समाप्त हो जाए और जितनी जल्दी हो, उतना अच्छा है, और आगे भी इस तरह के प्रयास करते रहेंगे। पुतिन ने कहा कि हथियारों से लैस जंग को सिर्फ कूटनीतिक बातचीत के जरिए ही खत्म किया जा सकता है। बता दें भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमी पुतिन से बात करके उन्हें जंग खत्म करने की सलाह दी थी।
रुस और युक्रेन के युद्ध का कारण

NATO संगठन बना सबसे बड़ा कारण
रुस और यूक्रेन के युद्ध के कई कारण है लेकिन सबसे बड़ा कारण नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (NATO) को माना जा रहा है। 1949 में सोवियत संघ से निपटने के लिए नाटो का संगठन किया गया था। इसकी स्थापना 4 अप्रैल 1949 में दूसरे विश्व युद्ध के बाद किया गया था। जिसमें अमेरिका और ब्रिटेन के साथ – साथ दुनिया के 30 देश भी शामिल हुए थे। नाटो के संस्थापक सदस्य बेल्जियम, डेनमार्क, फ्रांस, आइसलैंड, इटली, लक्जमबर्ग , नीदरलैंड, नॉर्वे, पुर्तगाल, यूनाइटेड किंगडम, अमेरिका हैं।
क्या है नाटो?

NATO का पूरा नाम नार्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (North Atlantic Treaty Organisation) है और यह एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन है। नाटो का उद्देश्य है जो राजनितिक और सैन्य साधनों के माध्यम से अपने सदस्य देशों को स्वतंत्रता और सेफ्टी की गारंटी देना हैं और सुरक्षा मुद्दों पर सहयोग के माधयम से देशों के बीच संघर्ष को रोकना हैं। नाटो के गठन के समय में जो समझौता हुआ था। उसके मुताबिक, कोई यूरोपी देश इसमें आकर शामिल हो सकता हैं उनके लिए हमेशा ही दरवाजा खुला हैं। नाटो के नियम के तहत अगर कोई नाटो से बाहरी देश अगर इसके मेंबर पर हमला करेगा तो सभी सदस्य देश मिलकर उसकी रक्षा करेंगे। क्योंकि अभी तक यूक्रेन नाटो का सदस्य नही बना है तो नाटो के सदस्य इसकी मदद खुलकर नहीं कर रहे हैं लेकिन अमेरिका ,ब्रिटैन ,कनाडा सीधे तौर पर यूक्रेन की मदद कर रहे हैं।
नाटो में शामिल देश

बता दें, कनाडा, फ्रांस, डेनमार्क, आइसलैंड, बेल्जियम, इटली, नीदरलैंड, नॉर्वे, लक्जमबर्ग, पुर्तगाल, यूनान, स्पेन,यूनाइटेड किंगडम ,जर्मनी, यूनाइटेड राज्य अमेरिका, टर्की, चेक रिपब्लिक, पोलैंड, बुल्गारिया, लातविया, हंगरी, एस्तोनिया, रोमानिया, लिथुआनिया, क्रोएशिया, मोंटेनिग्रो, अल्बानिया, स्लोवाकिया, स्लोवेनिया, नार्थ मैसेडोनिया अनेकों देश शामिल हैं।
रुस और यूक्रेन के बीच कब से चला आ रहा है युद्ध ?

- यूक्रेन की सीमा पश्चिम में यूरोप और पूर्व में रूस से जुड़ी है। 1991 तक यूक्रेन पूर्ववर्ती सोवियत संघ (USSR) का हिस्सा था। अलग होने के बाद भी यूक्रेन में रूस का प्रभाव काफी हद तक दिखाई देता था। यूक्रेन की सरकार भी रूसी शासन के आदेश पर ही काम करती थी लेकिन, बिगड़ती अर्थव्यवस्था, बढ़ती महंगाई और अल्पसंख्यक रूसी भाषी लोगों के बहुसंख्यक यूक्रेनी लोगों पर शासन ने विद्रोह की चिंगारी सुलगा दी।
- अमेरिका और ब्रिटेन समेत दुनिया के 30 देश नाटो के सदस्य है। सभी ने मिलकर सोवियत संघ को तोड़ने में महत्तवपूर्ण भूमिका निभाई थी। 25 दिसंबर 1991 को सोवियत संघ टूट गया। आपको बता दें कि, 1991 तक यूक्रेन सोवियत संघ का हिस्सा था। सोवियत संघ के टूटने से 15 देश अस्तिव में आ गए। जिनमें- आर्मीनिया, अजरबैजान, बेलारुस, अस्टोनिया, जॉर्जिया, कजाकिस्तान, कीर्गिस्तान, लातविया, लिथुआनिया, मालदोवा, रुस, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, यूक्रेन और उज्बेकिस्तान देश शामिल है।

- सोवियत संघ टूटने के बाद अमेरिका के नेतृत्व में ही नाटो का विस्तार हुआ था। सोवियत संघ से अलग हुए देशों में 2004 में इस्टानियो, लातविया और लिथुआनिया नेटो में शामिल हो गए। इससे रुस की सीमा पर खतरा बढ़ गया और रुस खुद को असुरक्षित महसूस करने लगा।
- 2008 में जॉर्जिया और यूक्रेन को फिर से नाटो में शामिल होने का न्योता दिया गया था लेकिन रूस के राष्ट्रपति व्लादिमी पुतिन ने इसको लेकर अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी फिर भी पुतिन की आपत्ति की परवाह किए बिना नेटो ने जॉर्जिया को संघठन में शामिल होने के लिए सभी रास्ते खोल दिए थे। इससे क्रोधित होकर रुस ने जॉर्जिया के अब काजिया और दक्षिण ओसेशिया को स्वतंत्र देश की मान्यता दे दी।

- रुस और यूक्रेन के बीच तनाव नवंबर 2013 में शुरु हुआ। जब रुस के समर्थक यूक्रेन के तत्कालिन राष्ट्रपति विक्टर यानूकोविच का कीव में विरोध शुरु हुआ। यानूकोविच को अमेरिका-ब्रिटेन समर्थित प्रदर्शनकारियों के विरोध के कारण फरवरी 2014 में देश को छोड़कर भागना पड़ा। यानूकोविच के भाग जाने से रुस ने दक्षिणी यूक्रेन के क्रीमिया पर हमला कर के उस पर कब्जा कर लिया। क्रिमिया में ज्यादातर लोग रसियन बोलने वाले थे। जो रुस से अधिक लगाव रखते है।
- रुस के द्वारा क्रीमिया पर कब्जा करने के बाद नेटो ने यूक्रेन को मजबूत करने के लिए हथियारों द्वारा लैस किया जाने लगा। इससे रुस को यह स्पष्ट हो गया कि आने वाले समय में नेटो की सेना और उसकी मिसाइलें हमारी सीमा पर आ कर खड़ी होगी। फिर यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने नाटो देश का सदस्य बनने के लिए 2 बार प्रयास भी किए थे लेकिन रुस की कड़ी आपत्ति से ये प्रयास फेल हो गए। इसके ऊपर रूस के राष्ट्रपति व्लादिमी पुतिन ने पिछले साल एक बयान भी दिया था। जिसमें उन्होंने ये कहा था कि, हमने साफ कह दिया है कि पूरब में नाटो का विस्तार हमें मंजूर नही है। अमेरिका हमारे दरवाजे पर मिसाइलों के साथ खड़ा है। अगर कनाडा या माक्सिको की सीमा पर मिसाइलें तैनात कर दी जाए तो अमेरिका को कैसा लगेगा?
- इस हमले की दूसरी वजह अमेरिका और पश्चिमी-यूरोपीय देशों का नार्ड स्ट्रीम 2 पाइपलाइन पर रोक लगाना भी शामिल है। आपको बता दें कि रूस ने इस परियोजना पर अरबों डालर का खर्च किया है। रूस इसके जरिये फ्रांस, जर्मनी समेत समूचे यूरोप में गैस और तेल की सप्लाई करना चाहता है। इससे पहले ये सप्लाई जिस पाइपलाइन के जरिए होती थी वो यूक्रेन से जाती थी। इसके लिए रूस हर वर्ष लाखों डालर यूक्रेन को अदा करता था। नई पाइपलाइन के बन जाने से यूक्रेन की कमाई खत्म हो जाएगी। यूक्रेन के रूस से अलगाव की एक बड़ी वजह में ये भी शामिल है।

- अमेरिका के वर्चस्व वाले इस संगठन में 30 देश शामिल हैं। जिनमें से अधिकतर यूरोप के ही हैं। हालांकि, इसमें सबसे अधिक जवान अमेरिका के ही हैं। रूस पर दबाव बनाने और अपने पुराने विवादों के कारण अमेरिका लगातार इस तरह की कवायद करता रहा है। अमेरिका पहले से ही रूस पर प्रतिबंध लगाकर उसको दबाव में लाने की कवायद कर चुका है। हालांकि, उसकी ये चाल अब तक काम नहीं आई थी। अब वो यूक्रेन के सहारे इस काम को करना चाहता है। रूस की चिंता ये है कि यदि यूक्रेन नाटो के साथ चला जाता है तो उसकी सेना और उसके हथियारों के दम पर अमेरिका उसको नुकसान पहुंचाने में आशिंक रूप से सफल हो सकता है।
- अमेरिका के अलावा अन्य कई देशों ने यूक्रेन को हथियारों की आर्थिक मदद करने के साथ – साथ उसे नाटो में भी शामिल करने की प्रकिया शुरु कर दी थी। जिसको देखकर रुस नाखुश हो गया था और इसी के चलते रुस ने यूक्रेन पर हमला करने की योजना बना ली। ठीक उसी तरह जैसे 2008 में जॉर्जिया के साथ किया था। आखिरकार रुस ने अमेरिका और अन्य देशों की पाबंदियों को ध्यान में ना रखते हुए 24 फरवरी 2022 को यूक्रेन पर हमला कर दिया।
युद्ध का दोनों देशों पर असर

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, रूस के 24 फरवरी 2022 को यूक्रेन में सैन्य कार्रवाई शुरू करने के बाद से 5,587 यूक्रेनी नागरिक मारे गए, जबकि 7,890 अन्य लोग घायल हुए। हालांकि, इस अनुमानित आंकड़े के असल आंकड़े से काफी कम होने की आशंका है। रिपोर्ट्स के अनुसार, पिछले छह महीने में युद्ध के चलते यूक्रेन को करीब 48 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है। यूक्रेन जैसे छोटे देश के लिए यह रकम बहुत बड़ी है। संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी के अनुसार, युद्ध के चलते यूक्रेन के 4.1 करोड़ से अधिक लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा है। रूस-यूक्रेन युद्ध में अब तक 60000 से अधिकरूसी सैनिक मारे गए हैं, जबकि 2,300 से अधिक टैंक नष्ट हो चुके हैं। इनमें से 500 रूसी सैनिकों की जान तो सिर्फ 24 घंटे में गई है। ये आंकड़े यूक्रेनी रक्षा मंत्रालय ने जारी किए हैं, जिनकी सत्यता की पुष्टि नहीं हो सकी है।
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